गणपत राव
प्रकाश गणपत जाधव
पत्र पत्रिकाओं में जब यह
नाम छपकर आता
तब तुम आकाश को पैबंद लगाने
लगते
भीड़ में कभी बेटा नज़र आ
जाता तो
तुम्हारा सीना चौड़ा हो जाता
था गणपत राव
आंदोलन की सुर्खियां,
कविता, लेख
इत्यादि की तुम माऊथ
पब्लिसिटी किया करते थे
हमारे संभलने के दिनों में
तुम हमारे सच्चे साथी हुआ
करते थे
और, तब तुम्हें कविता की कितनी
समझ थी
यह तो मैं नहीं जानता था
पर, कविता और गानों के तुम
पक्के दर्दी थे मुकादम
कामाठीपुरा के अलेक्झंडर के
नुक्कड़ पर
ईरानी होटल में , पानी कम चाय की चुस्कियों
के साथ
पुराने गीतों के रेकॉर्डस
पर
ठेका पकड़ते हुए कई बार देखा
था मैंने
पर हां, अन्य लोगों की तरह तुम
लंपट नहीं थे
मगर तमाशा और लावणी के
दीवाने थे तुम
जनता, कल्याण, वरली के आँकड़े
तुम्हारी ज़ुबान पर हुआ करते
थे
जिसके चलते घर को बर्बाद कर
दिया तुमने गणपत राव
हम छोटे थे मगर समझदार थे
तुम्हारे गले के क़ॅन्सर का जब
ऑपरेशन हुआ
तब दिमाग को प्रवाहित
होनेवाली ऊर्जा
मानों खंडित हो गई हो
उसी तरह सन्न हो गए थे हम.
मूल कविता – प्रकाश गणपत
जाधव
हिंदी अनुवाद – रमेश यादव
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