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कहानी - तबादला

कहानी
                                तबादला

                       शैलेश जी जैसे ही बैंक में आए सभी कर्मचारियों ने उनका स्वागत किया और अभिनंदनों की बरसात करने लगे। “ हार्टी काँन्ग्रच्यूलेशन सर, एन्ड ऑल दि बेस्ट” कहते हुए जेनी ने उन्हें गले से लगा लिया। जेनी शाखा की वरिष्ठ अधिकारी हैं और उनकी पूरी क्षमता है कि वह किसी भी शाखा की प्रबंधक बन सकें। मगर स्टेट के बाहर तबादले के खौफ़ के चलते उन्होंने पिछले दस वर्षों से प्रमोशन टेस्ट नहीं दिया । शैलेश जी से उन्हें विशेष लगाव है, दोनों एक दूसरे के अच्छे मित्र हैं। सहकर्मियों के इस प्यार और अपनत्व को स्वीकार करते हुए शैलेश जी ने भी सभी के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की। खुशी के मारे उनकी आँखें छलक गईं। चायवाला आया और सभी को चाय देकर चला गया।
        बैंक के काम- काज का समय हो रहा था। लोग चाय की चुस्कियों के साथ अपने– अपने टेबल पर आसीन हो गए। जैसे ही दरवान ने मुख्य फाटक खोला बाहर खड़े कस्टमर अपने– अपने काम निपटाने के लिए अलग– अलग काउंटरों पर बिखर गए। कुछ पैसे निकालने आए थे, कुछ भरने, कुछ डीडी बनवाने, कुछ लोग आरटीजीएस या एनईफटी करने आए थे। कई बुजूर्ग़ भी इस रेले में शामिल थे जो अपनी पेंशन निकालने के लिए आए थे। कुछ लोग जल्दबाजी में थे, तो कुछ लोग इत्मीनान से अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे।
       पिछले तीन साल से शैलेश जी बतौर अधिकारी इस शाखा में कार्यरत थे। अब उनकी पदोन्नति हो गई थी और वे प्रबंधक बन गए थे। कल देर शाम को ही पदोन्नति की लिस्ट मेल पर आ गई थी। तब तक सारे कर्मचारी जा चुके थे, अत: आज सबेरे लोगो ने उन्हें बधाईयां दी। शैलेश जी के लिए यह खुशी का दिन था। बड़ी प्यारी खबर थी पर अब तबादले को लेकर उनकी चिंता बढ़ गई थी। उम्र भी पचपन की हो गई थी। स्टेट से बाहर जाना उनके लिए संभव नहीं था।
       शैलेश जी का मन अशांत था, पर तन काम में लगा हुआ था। एक ओर टोकन देकर कैश चेक पास कर रहे थे, दूसरी ओर कैश रिसीप्ट की स्लीप पास कर रहे थे। साथ ही साथ चेक रिटर्न, चेक बुक भी जारी कर रहे थे। एटीएम की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर थी। रोज सबेरे कैश निकालना, शाम को कैश टॅली करके तिजोरी में रखना, कैश की पोजीसन मेंटेन करना, ग्राहकों को बैंक की नई योजनाओं की जानकारी देना, तिजोरी की चाबी संभालना, ( इस महान जिम्मेदारी के बदले बैंके से कोई आर्थिक लाभ नहीं ! बल्कि मानसिक तनाव अधिक था ) रेगुलर कैशियर के न आने पर नए आदमी को कैश में बैठाने के लिए माथापच्ची करना ! घंटे भर की ये परेशानी थी......कस्टमर के ताने अलग से बोनस में थे।रोज लगभग तीन सौ ग्राहकों से बात करना, उनके प्रश्नों के जवाब देना, दिन भर में बीस बार साहब का इंटरकॉम और ग्राहकों के फोन अटेंड करना, गाहे– बगाहे ट्रांस्फर स्लीप, एनईएफटी स्लीप भी पास करना था उन्हें.....। अधिकारी नहीं, मानो कोई सुपरमॅन हो.....। हर अनुभाग के अधिकारियों की लगभग यही स्थिति थी। प्रॉफिटॅबिलिटी को बढ़ाने के लिए बैंक द्वारा कर्मचारियों की संख्या में की गई कमी का यह नतीजा था। बैंक की नौकरी मतलब आग से खेलना। नज़र चूकते ही खतरे की संभावनाएं..... जोखिम भरा काम.....। गलती का खामियाजा तुरंत भुगतना पड़ता है। धोखाधड़ी और जालसाजी दिन- प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही थी । अब तो साइबर क्राईम के नए– नए तरीकें जालसाजों द्वारा अपनाए जा रहे हैं। हर बैंक कर्मी आज तनाव भरी जिंदगी जीने को मज़बूर है। बावजूद इसके समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा है। शैलेश जी जैसे कई अधिकारी इन परेशानियों के भुक्तभोगी हैं।                                 
       खैर ! नौकरी का दूसरा नाम मज़बूरी भी तो है। मज़बूरी से किया गया काम कितना सुकूनभरा हो सकता है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है ! शैलेश जी मन ही मन भगवान से प्रार्थना कर रहे थे- प्रभु पहला प्रोमोशन भी तबादले के चलते देर से लिया। दूसरा प्रमोशन समय पर हो गया है पर पोस्टिंग कहाँ होगी पता नहीं ! महाराष्ट्र में होगी तो ठीक है, वरना ये प्रमोशन लेकर मैं क्या हासिल करूंगा ! सिर्फ नाम के लिए कि बतौर मॅनेजर, बैंक से रिटायर हुआ। सीनियर होने के नाते वेतन में तो कोई खास इज़ाफा नहीं होगा बल्कि जिम्मेदारियां कई गुना बढ़ जाएंगी। जिम्मेदारियों से तो मैं भागना नहीं चाहता पर दूसरे स्टेट में तबादले की तमाम परेशानियों को कैसे झेलूँगा? जवानी के दिन होते तो झेल भी लेता ! मगर तब प्रमोशन इतना आसान नहीं था। अपने शहर में रहूँग़ा तो बैंक का बिजनेस बढ़ाने के लिए बहुत कुछ कर पाऊंगा। मगर बैंक प्रबंधन सब कुछ जानते हुए भी इस मर्ज़ को ना जाने क्यों बनाए रखना चाहती है ! समय के साथ – साथ अब इस सोच में भी बदलाव होना चाहिए। पांच साल की नौकरी बची है प्रभु किसी तरह पूरी कर लूँ यही काफी है । स्टाफ शॉर्टेज और टारगेट के चलते बैंक में मॅनेजर की नौकरी किसी गुलामी से कम नहीं है।     
                 शाम की चाय- पार्टी आज शैलेश जी के नाम थी। काम करते हुए लोग अपना – अपना मन हल्का कर रहे थे। क्लर्क लोग जल्दी- जल्दी काम निपटाकर घर भागने की तैयारी में लगे थे। ये ट्रांसफर और प्रमोशन की चिंता से मुक्त थे।
     तिवारी साहब जो बिहार से बतौर अधिकारी मुंबई पोस्ट हुए थे, कहने लगे कि मुंबई आने की खुशी तो बहुत थी पर यहां की लोकल ट्रेन की नारकीय यात्रा से थक गया हूँ। इससे तो अच्छा मैं अपने छोटे से शहर में ज्यादा खुश था। नौकरी मिली तो घर- परिवार की उन्नति भी हुई। यहां तो मैं कुछ बचा ही नहीं पा रहा हूँ। वहां बुजूर्ग माता- पिता परेशान रहते हैं। पटना में था तो गांव भी हो आता था। सुकूनभरी ज़िंदगी थी। अब तो सारा समय आने- जाने में ही बीत जाता है।
     मनोरंजन जो ओरिसा से आए थे, कहने लगे, “ सर, अब इस प्रमोशन के बाद सौ– डेढ़ सौ लोग सर्कल से बाहर जाएंगे और उतने ही लोग दूसरे सर्कल से आएंगे। ट्रान्स्पोर्टेशन, क़्वार्टर, क़्वार्टरों का रख- रखाव, फर्नीचर, जॉइनिंग पिरिएड, आने- जाने का खर्च, होटल का खर्च, भाषा की परेशानी इत्यादि के बारे में सोचा जाए तो बैंक का कितना नुकसान होता है ! एक ओर प्रोफिटॅबिलिटी की बात की जाती है तो दूसरी ओर रूरल, अर्बन, सेमी अर्बन पोस्टिंग पर बैंक फालतू में खर्च करती है, अब इस तरह के नियमों पर रोक लगाया जाना चाहिए, इससे बैंको को अधिक लाभ होगा । प्रोफिटॅबिलिटी को भी बढ़ाया जा सकता है। इस ट्रांसफर से आखिर हासिल क्या होता है ! जो लोग खुशी से जाना चाहते हों उन्हें जरूर भेंजे पर, मन मारकर सिर्फ मज़बूरी में ट्रांसफर होकर बाहर जाना करना कहां तक उचित है ! वो दौर अलग था जब अपने शहर से बाहर जाना फख़्र का विषय था। ”
        रिटेल बैंकिंग की अधिकारी जेनी मॅडम ने भी सुर मिलाया, “ हां इस सोच के चलते महिला कर्मचारियों का कितना बड़ा नुकसान होता है। नब्बे फीसदी महिलाएं तो प्रमोशन लेती ही नहीं ! ट्रांसफर को लेकर महिला- पुरुष कर्मचारियों में भेद- भाव को मैं उचित नहीं मानती। अगर ट्रांसफर इसी शहर में होता तो आज मैं भी किसी शाखा की मॅनेजर होती। आगे बढ़ना किसे अच्छा नहीं लगता ? जबकि बैंकिंग इंडस्ट्री में महिलाएं बेहतर सेवाएं प्रदान कर सकती हैं, और वे कर भी रहीं हैं। बैंकों से बाहर की दुनिया में भी महिलाओं ने अपनी काबिलियत को सिध्द किया है ।”
        पीछे से पाचपांडे जी बोले, “ यार अभी भी हम पूरी तरह से कॉम्प्यूटर से यूज़र फ्रेंडली नहीं हुए हैं, ट्रांसफर के बाद नया डिपार्टमेंट मिलता है, जिसे सीखने- सिखाने में ही महीनों बीत जाते हैं। काम करते हुए भी यदि गलती हो जाती है तो चार्जशीट जारी किया जाता है, ऐसा कौन- सी नौकरी में होता है यार ! इसी डर के मारे अधिकारी अपने काम को ठीक से अंजाम नहीं दे पाते । खैर, जब काम पकड़ में आ जाता है तो पुन: बदली हो जाती है। युवा उम्र में तो ठीक है पर फोर्टी प्लस – फिफ्टी प्लस में यह कहते हुए भी संकोच होता है कि काम सीखना पड़ेगा, जबकि लेजर के ज़माने में हम हर डिपार्ट्मेंट के मास्टर हुआ करते थे। नई तकनीकी का लाभ बहुत है पर वह यूजर फ्रेंडली होना चाहिए । यहां तो रोज का रोना है, कभी सर्वर प्रोब्लेम, तो कभी हैंग की समस्या.....डीआईटी को फोन लगाओ तो, वहां जल्दी कोई फोन नहीं उठाता...., वही स्टाफ शॉर्टेज का रोना वहां भी है...., कुल मिलाकर सिस्टम के साथ घंटों जूझना पड़ता है, जिसके चलते समय की बरबादी होती है और कस्ट्मर को परेशानी अलग से....।”
        युवा प्रोबेशनरी अधिकारी प्रदीप भी भिड़ गए, “ सर, हम तो यहां होटल के खाने से तंग आ चुके हैं। ऑफीस में मर- मर के काम करने के बाद घर जाकर, खाना बनाना, कपड़े- बर्तन धोना, सफाई इत्यादि करना तो किसी काले पानी की सजा से कम नहीं लगती । मगर क्या करें साहब, दिन गिन रहे हैं ! सोचते हैं कब मुक्ति मिले और घर का दाना- पानी नशीब हो......।“
        “ मगर सर, नोटबंदी के दौर में हम बैंकवालों ने जिस ज़ज़्बे के साथ काम किया वास्तव में वह देश सेवा की मिसाल थी। पूरे देश ने हमारे कामो को सराहा। मगर हमारे ही कुछ बंधुओं की नासमझी के चलते आज हम सभी की शाख मिट्टी में मिल गई है। लोग – बाग तो सभी बैंककर्मियों को बदनाम करते हैं, यह तो उचित नहीं है। सर, रात के बारह- बारह बजे तक हमने काम किया पर वह हमें बोझ नहीं लगा। बल्कि दूसरे दिन खुशी से पुन: सारे लोग टीम स्प्रिट से काम करते नज़र आए। यह हमारे जीवन में नया अनुभव रहा। काश, इसी तरह लोग रोज टीम स्प्रिट से काम करते तो एक दूसरे का बोझ हम हल्का कर पाते।” विजय जी ने ट्रांसफर के मुद्दे से सबका ध्यान हटाया।  
        “ नोटबंदी के दौरान लोगों ने बैंकों के बाहर लंबी- लंबी कतारें देखीं। उनकी परेशानियों से हम भी दो– चार होते रहे। कई लोगों की जाने भी गई। कई लोगों ने सौदेबाजियां भी की। कई जगहों पर तो सुरक्षा के लिए पुलिस बुलानी पड़ी। गरीब ठेलेवाले, हाथगाड़ियां चलानेवाले और चालू किस्म के लोग पैसों के लालच में कमिशन बेसिस पर व्यापारियों के नोट बदलवाने के लिए सुबह से ही कतार में खड़े होते और एक बैंक से दूसरे बैंक की दौड़ लगाते नजर आए.... । अंगुली पर लगी स्याही को तुरंत मिटाने के भी कई उदाहरण हमने देखें । इन जैसे कितने लोगों को हमने पुलिस के हवाले किया, इसके बाद अपने खातों के ज़रिए भी नोट बदलवाने के धंधे में कई लोग लिप्त रहे।” रमाकांत ने अपनी बात रखी।
        “ हां भाई, मगर बैंककर्मियों ने क्या कम पीड़ा भोगी ! कई लोग बीमार पड़ गए। घर – परिवार के जरूरी कामों को छोड़कर देश और बैंक की सेवा में दिन- रात जुटे रहे। अपने मित्रों और परिवार की  शादियों में भी लोग शरीक नहीं हो पाए। तिवारी जी के भांजे की सगाई पटना में थी वे नहीं गए। रमेश साहब के पैर में बड़ा- सा फोड़ा हो गया था, वाबजूद इसके वे लंगड़ाते हुए अपनी रोज की ड्यूटी पर आ रहे थे। अरविंद साहब कंधे से कंधा मिलाकर देर रात तक काम करते रहे।“ शीला मॅडम ने पक्ष रखा।
        “ टीवी चॅनेल की न्यूज के अनुसार अपनी निजी ज़िंदगियों की तमाम परेशानियों को छोड़कर देशभर के बैंक कर्मी दिन- रात लोगों की मुश्किलें दूर करते रहे। अहमदाबाद में एक महिला कर्मचारी चित्रा, काम के तनाव के मारे बेहोश होकर गिर गई। नागपुर के एक कैशियर कमल रंगवानी को दिल का दौरा पड़ा और ऑन दि स्पॉट उनकी मौत हो गई। जयपुर की बैंक अधिकारी मनीषा यादव की दादी गुज़र गई थी पर वो अपनी दादी के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाई। उसके पापा पूर्व बैंकर थे, तो वे बैंक की जिम्मेदारियों और जवाबदेही को समझते थे, अत: उन्होंने मनीषा को गोरखपुर आने से रोक दिया। रोहतक के एक को- ओपरेटिव बैंक के मॅनेजर राजेशचन्द्र की हार्ट अटैक से मौत हो गई। वे तीन दिनों से बैंक में ही रूके थे। कई लोगों का शुगर बढ़ गया था। छुट्टियां ना मिलने की वजह से लोग अपना इलाज नहीं करवा पा रहे थे।” व्हाट्सअप्प पर के विडिओ को दिखाते हुए अमीता मॅडम भावुक हो गई।
        “ हमारे यूनियन लीडर दीपक जी लगातार शाखा में अपनी सेवाएं दे रहे थे। लोगों को तसल्ली देकर हौसलाआफ़जाई कर रहे थे। मुख्य प्रबंधक लगातार लोगों पर ध्यान देते हुए कर्मियों के साथ बैठकर काउंटर संभाल रहे थे। नोटों को टैली करने में उन्होंने बड़ी अहम भूमिका निभाई। कुछ गद्दारों के चलते  आज हमारी बदनामी देशभर में हो रही है। सरकार को चाहिए कि इन गद्दारों को पकड़कर लोगों के सामने पेश करे और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दे, तथा हमें बदनामी से मुक्त कराए, तब उन शहीदों की आत्मा को संतुष्टि मिलेगी। ” मनीषा जी तेवर में आ गई। लोगों ने उन्हे शांत किया।                                
       शाम को शैलेश जी जब घर पहुँचे तो परिवार के साथ अपनी प्रमोशन की खुशी को शेयर किया। सभी ने मानो आसमान छू लिया हो। पत्नी सुलेखा ने बड़े प्यार से उनका उनका आरती- तिलक किया। बिटिया- रानी भी खुश थी। खुशी के इस मौके का सहारा लेते हुए शैलेश जी ने रानी से पूछा,
    “ बेटे आप हमारी इकलौती संतान हो। नौकरी के सिलसिले में हम दोनों दिनभर बाहर रहते हैं। तुम्हारी परवरीश में जो भी बेहतर हो पाया, उसे करने की हमने पूरी कोशिश की। कुछ दिनों में तुम भी नौकरी करने लग जाओगी, मगर तुम्हारे शादी की चिंता हमें अब सताने लगी है। अब तुम एक मित्र की तरह बताओ कि हम तुम्हारे लिए दुल्हा ढूँढ़ें या तुमने ढूँढ लिया है ! तुमने इंजीनियरिंग की है, अपना भला- बुरा अच्छी तरह से जानती हो। तुम्हारी खुशी में ही हमारी खुशी है।”
     पत्नी सुलेखा ने बिटिया को गोद में भर लिया, “ हां बेटे जो है साफ – साफ बता दो। अब ज़माना बदल गया है।”
     रानी बिटिया शरमा गई, “ मम्मी, पापा होने के साथ- साथ आप दोनों अच्छे मेरे मित्र भी हैं, इसे मैं अपने बचपन से ही महसूस करती आ रही हूँ। मैं अपने आपको सबसे खुशनशीब मानती हूँ कि आपकी कोख से मैंने जन्म लिया। आज़ाद पंछी की तरह मैंने अब तक की ज़िंदगी जी है। एक बेटे की तरह आप लोगों ने मुझे पाला है। मेरा कोई अफेयर नहीं है। मित्र तो कई हैं, पर लव मॅरेज या इंटरकास्ट मॅरेज में मुझे कोई रुचि नहीं है। जिन लोगों ने इस तरह से शादियां की हैं उनकी परेशानियों और सोच को मैं देख चुकी हूँ। मेरे मामा खुद इसके भुक्तभोगी हैं। सो आय एम वेरी मच क्लीयर इन धीस मॅटर। आप लोग जिससे कहेंगे मैं उससे शादी कर लूंगी। आप दोनों के बीच जितना प्यार, स्नेह, सम्मान है, उसे मैं बचपन से देख रही हूँ, आप दोनो मेरे लिए आदर्श हैं।” और वह पापा से लिपट गई।
     शैलेश और सुलेखा जी की आंखें छलक गई। दोनों ने बिटिया को चूम लिया। दोनों ने मिलकर तय किया कि दो- तीन दिन दोनो ऑफीस नहीं जाएंगे। भविष्य की योजनाएं बनाएंगे। दूसरे दिन बड़े सबेरे उठकर शैलेश जी, अपने मित्र सदानंद के घर गए और तिजोरी की चाबी उसे सौंपते हुए बोले,
 “ प्लीज इसे मॅनेजर साहब को दे देना।”                    
        आखिर वह दिन भी आया जब शैलेश जी को तबादले का पत्र थमाया गया। उनकी पोस्टिंग जयपुर के किसी रूरल ब्रांच में कर दी गई थी। ये वही शैलेश जी थे जो नोटबंदी के दौरान रात बारह बजे से पहले कभी घर नहीं गए। उसके बाद छुट्टीवाले दिन भी बैंक आकर मॅनेजर एवं अन्य चुनिंदा कर्मियों के साथ मिलकर नोटों का मिलान भी किया।
       तबादले की इस खबर ने उनके उम्मीद की आखिरी खिड़की बंद कर दी थी ।  पद और प्रतिष्ठा के सुनहरे सपनों का इस तरह बिखर जाना जीवन के दिलचस्पियों को खत्म कर रहा था । वह रात उन्हें बोझिल सी प्रतीत हुई। उसी उनींदी रात में ही उन्होंने अपना निर्णय पक्का किया और दूसरे दिन मुस्कुराते हुए अपने साहब के पास गए, जेब से एक चिट्टा निकाला और बोले,             
         “ उम्र के इस पड़ाव पर रूरल ब्रांच में जाकर मैं भला क्या सिखूंगा और काम करूंगा ! वहां तो लोग यही कहेंगे ना कि मॅनेजर साहब को काम नहीं आता ! वैसे भी पत्नी की तबियत ठीक नहीं रहती है, बेटी की शादी की उम्र हो गई है। मेरे लिए ये जिम्मेदारियां अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।” यह कहते हुए उन्होंने अपना रिवर्सन पत्र एजीएम को सौंप दिया। हवा की तरह खबर चारो ओर फैल गई । पूरी ब्रांच में सन्नाटा छा गया। उदासी की एक लंबी चादर लोगों के चेहरों पर पसरी नज़र आ रही थी। मानों लोग अपने दिल से पूछ रहे थे, क्या है कोई लेखा- जोखा पल- पल की इस पीड़ा का ! 

रमेश यादव.

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एन.एम. जोशी मार्ग, चिंचपोकली ( पश्चिम )
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