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कविता - तस्वीर

  तस्वीर

ढलती  हुई  वह
अलसायी शाम
मुझे खींच ले गई
जहाँगीर आर्ट ग़ॅलरी
के उस दालान में
जहाँ सजी थी
कूँचियों की कलात्मकता

यहाँ की शामें अक्सर
तन्हाईयों के कॅनवास पर
सृजन के आयामों से
सुकून का रंग भर देती हैं

करीने से सजी
उन तमाम तस्वीरों में
वह जीवंत तस्वीर
बरबस सबका ध्यान
अपनी ओर खींच रही थी

तस्वीर में उस
मासूम से कुछ बच्चे
गुलशन में गुलज़ार
को आतुर, उन
कलियों के बीच
उदास बैठे थे
रोटी के लिए
इस उम्मीद के साथ
कि आयेगा कोई जोड़ा
और उन्हें दे जायेगा कुछ


उस नीलामी में
दस लाख में बिकी वह तस्वीर
एक हृदय विदारक
सत्य के साथ
कि न जाने कितने मासूम
वास्तविक ज़िंदगी में
बिलबिला रहें हैं सड़कों पर
भूख से तड़पते
हालात से मजबूर
तन - भर कपड़े
और एक रोटी के लिए .




रमेश  यादव .

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