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कहानी - दादाजी

कहानी
                                     दादाजी
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           अक्षा अर्थात अक्षया आज कॉलेज से जल्दी घर आ गई. शायद उसकी तबियत ठीक नहीं थी. आते ही अपने कमरे में जाकर सो गई.
शाम के पांच बज रहे थे. अक्षया ने चाय बनाई और दादाजी के टेबल पर रखकर पुन: अपने कमरे में चली गई. दादाजी ने चाय पी और पार्क में टहलने चले गए. घर की साफ- सफाई करके अक्षया किचन की ओर मुड़ गई. उसकी मम्मी पिछले दो दिनों से अस्पताल में भरती थी. पापा काम के सिलसिले में कुछ दिनों के लिए गांव गए थे. छोटा भाई खेल- कूद और क्लासेस में व्यस्त था. रसोई की जिम्मेदारी अक्षया पर थी.
             वैसे अक्षा के लिए यह कोई नई बात नहीं थी. स्कूल के दिनों से ही वह मम्मी के साथ किचन में काम करती थी. मां तो नहीं चाहती थी कि अक्षा अभी से किचन का काम संभाले पर अक्षा को रसोई का बड़ा शौक था. यह शौक उसे अपनी मामी से मिला था. मामी के हाथों बना खाना खाकर लोग अंगुलियां चाटते थे. खानेवाले बड़े दिल से मामी की तारीफ करते थे और कहत “ अन्नदाता सुखी भव: ”
        इससे परिवार के अन्य महिला सदस्यों को ईर्ष्या भी होती थी. घर के बड़े बुजूर्ग जब मामी को आशीर्वाद देते – अन्नदाता सुखी बह: तो अक्षा के मन में हमेशा यह बात कौंध जाती कि एक दिन वह भी मामी की त्रह अच्छा कूक बनेगी और लोगों से वाह – वाही एवं आशीर्वाद लूटेगी.
        दादी के स्वर्गवास के बाद दादाजी अकेलापन दूर करने के लिए खूब घूमने टहलने लगे थे. एक पैर घर में अर्थात मुंबाए तो दूसरा पैर गांव में. गांव में फार्म हाउस बनवाकर वहां बड़े पैमाने पर बागवानी भी कर रखी थी. जहां भी जाते लोगों से मेल- जोल बढ़ाते और खूब गप्प हांकते. पुराने मित्रों से मिलने उनके घर जाते. अपने पुराने दिनों को याद करते. उम्र के अस्सी साल पूरे कर लेने के उपलक्ष्य में “ सहस्त्र चन्द्र दर्शन ” जैसे एक बड़े कार्यक्रम का आयोजन किया था. सामाजिक कार्यों में पूरा जीवन बिता दिया था. अत: इसी काम में लगे रहते. लोगों को मदद करते. कई लोग अपनत्व की भावना से अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में सलाह – मशवरा करने भी उअनके पास आते थे. कभी पिकनिक पर जाते तो कभी बच्चों के साथ बच्चा बन खेलने लग जाते.
          आज शाम को दादाजी टहलकर जब घर लौटे तो देखा कि सात बज रहे हैं, देवघर में अभी दीप नहीं जला था.
“ अक्षू बेटा ! कहां हो जरा यहां तो आना.”
“ येस दादाजी, अक्षू इज हाजिर, हुकूम दादाजी !” दरअसल अक्षू दादाजी की प्यारी गुड़िया थी. वे उससे बहुत प्यार करते थे. उसे खूब पढ़ाना चाहते थे. अक्षू भी दादाजी को उतना ही प्यार करते थे. मानों दोनों एक दूसरे के दोस्त हों.
“ अरे मेरी गुड़िया , जरा जरा सुन तो, दादू को एक बार और चाय पिला दे और मेरे एक मित्र आ रहे हैं, उनके लिए भी बना देना. और हां अपने लिए और पप्पू के लिए चाय बना लेना.”
“ दादू सरकार सबको तो चाय मिल जाएगी पर आपको नहीं मिलेगी. शूगर का ख्याल करो.”
“ ठीक है मगर एक बार दे दे थोड़ा मीठा कम कर देना.”
” ठीक है दादा सरकार अभी कुछ देर में हम आपकी खिदमत में हाजिर हो जाते हैं. तब तक एक – दो फोन और कर लें.”
“ बच्चा, सुनों सात बज रहे हैं देवघर में दीप नहीं जला है. दीप जलाकर पूजा भी कर लेना. बहू घर में नहीं तो लोग भगवान को भूल गए हैं. कल भी मैंने देखा तो दीप नहीं जला था.”
“ अच्छा दादाजी.”
               कुछ देर बाद दादाजी के मित्र आ गए. चाय नास्ता करते हुए वे लोग गपशप में व्यस्त हो गए. कुछ देर बाद दादाजी कुछ लेने के लिए देवघरवाले कमरे में गए तो देखते हैं कि दीप आज भी नहीं जला है. खैर कुछ सोचते हुए वे पुन: मित्र के साथ बातों में व्यस्त हो गए. मित्र जब चला गया तो वे सोचने लगे- ..........आखिर क्या बात है ! अक्षू ने दीप नहीं जलाया. वैसे वो तो होनहार लड़की है. कभी कोई भूल नहीं करती ना ही अपने काम में कोताही बरतती है. कल से ऐसा क्यों हो रहा है, सारे काम करती है पर दीप नहीं जलाती..........लड़कियों को तो संस्कारी होना चाहिए. पूजा- पाठ और भक्ति भाव का संस्कार तो उनमें जरूर होना चाहिए. माना कि अक्षू अभी छोटी है, पर इतनी भी तो छोटी नहीं........! शायद बहू ने उसे ठीक से समझाया नहीं होगा. कल बहू से इस बारे में जरूर बात करूँगा. यह सोचकर वे अपने काम में व्यस्त हो गए.
         दूसरे दिन दादाजी निश्चित समय पर टिफीन लेकर अस्प्ताल गए. बहू से तबियत के बारे में पूछा, इसके बाद कुछ इधर – उधर की बातें की. बहू ने बातें करते हुए टिफीन खत्म किया और नर्स ने जो दवाईयां दी थी उसे खाकर बोली, “ दादाजी, डॉक्टर ने दो दिन और रूकने को कहा है, तब तक घर का और बच्चों का ख्याल रखना. और हां, अक्षा ने दो दिन से देवघर में दीप नहीं जलाया क्योंकि उसका मासिक धर्म चल रहा है. आप से वह यह बात कह नहीं पायी इसलिए मुझे फोन करके उसने मुझे बताया. कहीं आप बुरा ना मान जाएं. आपकी आज्ञा का पालन ना करने का उसे अफसोस हो रहा था. पप्पू की तो क्लासेस रहती हैं , तो दो दिन आप ही दीप जला लेना, परसों से मैं सारी जिम्मेदारी संभाल लूंगी ना प्लीज......”
“ ठीक है बहू इसमें अफ़सोस की क्या बात है ! वैसे तो ये काम मुझे ही करना ही चाहिए पर बच्चों को भी आदत लगनी चाहिए इसलिए नहीं करता. पूजा- पाठ की बजाय मुझे कर्म में ज्यादा विशवास है.”
आगे कुछ ना बोले और अपनी नम आँखों को पोंछते हुए बाहर निकल आए. घर लौटते हुए सोचे जा रहे थे कि आखिर मैं तो अक्षू का अच्छा मित्र हूँ तो उसने ये बात मुझसे क्यों नहीं बताई........लड़की है ना ! शायद शरमा रही होगी.....मगर अब तो वह इंजीनियर बनने जा रही है. आगे की पढ़ाई के लिए विदेश भी जाना चाहती है तो उसे तो मॉडर्न होना चाहिए......मगर मैं भी कितना ना समझ हूँ कि इस छोटी- बात को नहीं समझ पाया और उसके बारे में ना जाने क्या – क्या सोचता रहा. अक्षू सयान हो गई और मुझे पता भी नहीं चला. घर में क्या- क्या होता है सारी जानकारी मुझे होती है फिर यह बात .........खैर , अक्षू कितनी समझदार है ना ! दोस्त होकर भी इस बात पर लजा गई......हे प्रभु, बच्ची की रक्षा करना, उसकी हर मनोकामना पूरी करना.
        शाम होते ही रोज की तरह अक्षा ने दादाजी जी को चाय दी. दादाजी ने चाय की चुस्कियां लेते हुए कहा, “ अक्षू सरकार, आज देवघर का दीप हम जलायेंगे. उसके बाद टहलने जाएंगे, वहां से आपकी मम्मी के पास अस्पताल जाएंगे और लौटते हुए रेस्तरां से दो- तीन चायनीज डिश लाएंगे. घरपर हम सभी मिलकर खाएंगे. इसलिए आज घर में रसोई नहीं बनेगी. मेरा मन चाय्नीज खाने के ललचा रहा है.
“ जी दादाजी ! ” कहते हुए अक्षू शरमा गई और अपने कमरे में चली गई. वह सोचने लगी – क्या दादू को मेरी मजबूरी का पता चल गया ! आज अचानक दीप जलाने की बात क्यों कर रहे हैं ?
        अक्षा को चायनीज खाना बहुत पसंद है यह दादाजी जानते थे. चाय खत्म की. देवघर में दीप जलाया. जेब में बटुआ रखा और छड़ी हवा में लहराते हुए घर से बाहर निकल गए.
·         

रमेश यादव.
·मुंबई – फोन – 9820759088

·Email rameshyadav0910@yahoo.com                                           

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