लघुकथा
खेल बनाम साहित्य
मुंबई का आपा-धापी भरा जीवन में भी किसी तरह लोग अपने लिए थोड़ा सा जीवन तो चुरा ही लेते हैं. कुमार टिपिकल मुंबईया के
साथ- साथ एक प्रोफेशनल बैंकर भी है. लिखना उसका पॅसन है. उसकी रोजनिशा हमेशा की
तरह शुरू हुई. वह अखबार का इंतजार कर रहा था. आज उसे किसी खास न्यूज का इंतजार था.
अखबार मिलते ही पन्ने पलटते हुए सरसरी नजर से उस लंबी लिस्ट में उसने अपना नाम ढूँढ
ही लिया. “ थँक्यू ग़ॉड ” कहते हुए उसने
अखबार चूम लिया. उसके खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा. उसके उपन्यास को राज्य साहित्य
अकादमी का प्रथम पुरस्कार घोषित किया गया था.
बगल
में छपी एक और न्यूज कुमार को आकर्षित कर रही थी, क्रिकेट खिलाडी़ व्यंकटेश को नॅशनल
अवार्ड मिलने पर उसके बैंक ने उसे प्रमोट करके मॅनेजर बना दिया था, ताकि वह और
समर्पित भावना से खेलता रहे और बैंक का नाम रोशन
करता रहे.
पुरस्कार मिलते ही वह अपने बैंक के महाप्रबंधक से मिलने गया. केबिन के
सामने मिठाई, फोटो और न्यूज लेकर वह अपनी बारी का इंतजार करता रहा. सामने एक बडी़-
सी तस्वीर लगी थी, जिसमे साहब “सी.एम.डी.” से पुरस्कार लेते हुए मुस्कुरा रहे थे. बगल में एक पोस्टर
लगा था - मुंबई सर्कल ने इस वर्ष पाँच लाख करोड़ का बिजनेस टारगेट पूरा कर लिया. टारगेट पूरा करने पर
प्रमोशन तो तय था. साथ ही इंस्यूरेंस व्यापार पर कमीशन और विदेश
टूर अलग से. खैर..........! यह सोचते हुए कुमार अंदर गया और अपनी सबसे प्रिय खबर साहब
को सुनाई साथ ही मिठाई आगे कर दी.
साहब
ने “ कॉग्रेट्स ” करते हुए पूछा, “ व्हाट इज धीस साहिट्य
अकादेमी ? इज इट हिन्दी अवार्ड
? ” कुमार ने समझाया, न्यूज और
फोटो भी दिखाया. “ ओह दॅट मिन्स यू आर अ राइटर ? आर यू रायटिंग इन
बैंकिंग आवर आल्सो ? ” “ नो सर, नॉट एट आल, लिखना
इतना आसान काम नहीं होता. इट्स नॉट पासिबल सर ! ” कुमार ने जवाब दिया. साहब की इस सोच पर उसे तरस आ गई. “ वेदर बैंक इज गोइंग टू गेट एनी बेनीफिट्स फ्रॉम
धीस ? ” कुमार को लगा जैसे किसी ने
उसे तमाचा जड़ दिया हो ! पर अपने को संभालते हुए किसी तरह से उसने साहब को समझाया,
“ सर,राज्य स्तर का यह बड़ा ही अहम और सम्मानजनक पुरस्कार है, जो जीवन में शायद ही कभी –
कभार मिलता है. मेरे इस पुरस्कार से बैंक का भी नाम रोशन हुआ है सर ”. मगर साहब के चेहरे पर कोई खास प्रभाव दिखाई नहीं दिया. मुँह
फेरकर वे फाईलों में पुन: व्यस्त हो गए.
कुमार चलने लगा, अचानक वह मु्ड़कर बोला, “ सर ! साहित्य और संस्कृति को
लेकर प्रोत्साहन, पदोन्नति, विशेष छूट्टी, जैसी कोई गाईडलाइन सरकारी, अर्ध सरकारी महकमों
में नहीं है, जो कि खिलाड़ियों को प्राप्त हैं. अन्यथा
आप इस तरह से पेश नहीं आते ! राष्ट्र और राज्य के उत्थान में साहित्य और संस्कृति
का भी बड़ा अहम योगदान होता है. साहित्य से जुड़े कर्मचारी अपनी नौकरी की
जिम्मेदारियों को संभालते हुए देश, दुनिया, समाज, और अपनी संस्था का नाम तो रोशन करते
ही हैं, साथ ही समाज को दिशा देते हैं, और आईना भी दिखाते हैं. इस पुरस्कार ने
बैंक के लिए इमेज बिल्डिंग का काम किया है, जिसके लिए बैंक करोड़ो रुपए खर्च करती
है. आप इस बात को नहीं समझेगें ! या फिर समझना नहीँ चाहते सर ! मगर
एक दिन ऐसा जरूर आयेगा जब आप जैसे लोगो को अपनी इस सोच को बदलनी पड़ेगी. एक दिन हिंदी
की कलम भी जागेगी जो अपना अधिकार लेकर रहेगी. और केबिन का दरवाजा खोलकर कुमार सीधे बाहर निकल गया.
·
रमेश यादव
·481-161 – विनायक वासुदेव
·एन.एम. जोशी मार्ग,
·चिंचपोकली – पश्चिम , मुंबई- 400011
·फोन- 09820759088
·Email- rameshyadav0910@yahoo.com
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें